हम किस समानता और आदर्शवाद की बात करते हैं मुझे समझ नहीं आ रहा हैं। पता हैं पता हैं आपको आज किसान सामाजिक प्रगति से और वित्तीय दौड़ में पीछे चला जा रहा हैं, मुझे याद हैं की मेरे गांव अकारु में आज के 16 साल पहले लगभग किसानो के घरो में पानी पीने वाले भैसे या बैल की जोड़ी होती थी और तकनिकी क्रांति ने उनके जगह पर डीजल पीने वाले ट्रक्टर को खड़ा कर दिया और डीजल महंगा होने से फिर से भैंसों और बैलो के दिन आ गए हो गया न किसान इस सदी में पिछड़ता हुआ वर्ग ये सूचना क्रांति के पीछे दौड़ती सरकार ये क्यों नहीं समझती हैं महंगाई या मंदी भी किसानो के उन्नति का कारण नहीं बन पा रही वास्तव में ये समाज आज दो भागो में विभाजित होता चला जा रहा एक सुविधा भोगी* और एक संघर्ष भोगी* जो किसान हैं आज ये मात्र ऐसा वर्ग हैं जो संघर्ष करके ही जीवन यापन कर रहा हैं
व्यापारिक वर्ग तो किसी तरह के मूलभूत महंगाई होने पर अपने व्यापारिक प्रक्रिया को महंगा करके अपना वित्तीय संतुलन बना लेता हैं, और रही बात नौकरी पेशा की महंगाई के साथ उसका भी पूर्व निश्चित महंगाई भत्ता मिल जाता हैं, बेचारा किसान वो कहाँ से संतुलन बिठाये इस महंगाई के नाम पर किसान तो अपनी फसल का मूल्य भी अपने और महंगाई के अनरूप निश्चित नहीं कर सकता हैं ,
कैसे हम आज सामाजिक और आर्थिक समानता की बात करे कभी कभी या ज्यादातर तो किसान को अपने लगत मूल्य के बराबर भी कीमत नहीं मिलती हैं मरा बेचारा किसान ऊपर से डीजल महंगा,
जरा सोचिये मित्रो यदि जरा सी महंगाई हमारे किसान भाइयो को लाभ हो जाये तो क्या बुराई हैं ये सरकार तो करने से रही तो जरा हम और आप ही ये जिम्मदारी उठाते हैं थोड़ी सी खाद्य पदार्थो इ ज्यादा कीमत देकर और प्रमुख फसलो के समर्थन मूल्य को एक आदर्श रूप में स्थापित करने की मांग करते हैं ..